Source : The Indian Express
हाल ही में कश्मीर के कुछ नेताओं ने यह बात उठाई कि कश्मीर में पहले की भाँति एक प्रधानमंत्री अलग से होना चाहिए और सदर-ए-रियासत का पद फिर से स्थापित होना चाहिए. इसी माँग के संदर्भ में एक नया विमर्श आरम्भ हो गया है जिसमें प्रधानमंत्री के साथ-साथ सदर-ए-रियासत का पद फिर से लाने के पक्ष-विपक्ष में तर्क दिए जा रहे हैं.
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- जम्मू-कश्मीर संविधान सभा सितम्बर, 1951 में गठित हुई और जनवरी 25, 1957 तक चली. इसने जो संविधान तैयार किया वह नवम्बर 17, 1956 में अंगीकृत हुआ और जनवरी 26, 1957 से प्रभावी हुआ.
- इस संविधान सभा ने यह संकल्प लिया था कि जम्मू-कश्मीर का शासन प्रमुख भारत द्वारा नियुक्त राज्यपाल न होकर वहाँ के विधान सभा द्वारा चुना हुआ सदर-ए-रियासत होगा जिसे भारतीय राष्ट्रपति की मान्यता प्राप्त होगी. भारत सरकार ने इस व्यवस्था पर अपनी हामी भर ली थी.
- योग्यता :- केवल जम्मू-कश्मीर का कोई स्थायी निवासी ही सदर-ए-रियासत हो सकता था. वह वहाँ के विधानसभा द्वारा चुना जाता था और फिर भारतीय राष्ट्रपति उसे मान्यता देकर नियुक्त करते थे.
- 1965 के पहले तक जम्मू-कश्मीर में एक अपना प्रधानमंत्री और सदर-ए-रियासत हुआ करता था. 1965 के बाद यह दोनों पद मुख्यमंत्री और राज्यपाल में बदल दिए गये.
- स्वतंत्रता के पहले भी जम्मू-कश्मीर में प्रधानमंत्री का पद हुआ करता था. पहले प्रधानमंत्री के रूप में सर. एल्बियन बनर्जी (1927-29) की नियुक्ति डोगरा शासक महाराजा हरि सिंह ने की थी उसके पश्चात् स्वतंत्रता के पहले जम्मू-कश्मीर में नौ और प्रधानमंत्री हुए थे.
जम्मू-कश्मीर संविधान का छठा संशोधन
- यह संशोधन 1965 में किया गया था जिसके अनुसार सदर-ए-रियासत का पद बदलकर राज्यपाल कर दिया गया, परन्तु संविधान की धारा 147 में संशोधन नहीं हुआ. फलस्वरूप एक समय ही जम्मू-कश्मीर में दो शासन प्रमुख हो गये – सदर-ए-रियासत और राज्यपाल.
- 2015 में जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने यह निर्णय लिया कि सदर-ए-रियासत का पद बदलकर राज्यपाल करना असंवैधानिक था.
- उच्च न्यायालय का तर्क था कि निर्वाचित सदर-ए-रियासत का पद राज्य के संविधान के बुनियादी ढाँचे का एक अभिन्न अंग है, अतः राज्य विधान सभा को यह शक्ति नहीं कि इसमें वह संशोधन कर सके.
- छठे संशोधन ने न केवल सदर-ए-रियासत का नाम ही बदला, अपितु उसकी योग्यता तथा उसकी नियुक्ति के तरीके को भी बदल डाला.
राजनैतिक पहलू
जम्मू-कश्मीर के स्थानीय राजनैतिक दल राज्य में पुरानी स्वायत्तता वापस लाना चाहते हैं. 1996 में नेशनल कांफ्रेंस दल को विधान सभा चुनावों में दो तिहाई बहुमत मिला. इससे उत्साहित होकर उसने एक राज्य स्वायत्तता प्रतिवेदन पारित किया जिसमें माँग की गई कि 1993 में राज्य को जो स्वायतत्ता मिली हुई थी, वह वापस लाई जाए. इसका अभिप्राय यह हुआ कि फिर दुबारा प्रधानमंत्री और सदर-ए-रियासत दोनों पद लाये जाएँ. इस प्रतिवेदन को वाजपेयी सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया था.